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Monday, September 18, 2017

zakhm

मेरे दाएं पाँव की कनिष्ठ
ऊँगली में ज़ख्म था..
खून निकल के सूखने लगा था
नगण्य ऊँगली को अनदेखा कर
मैं सड़क किनारे
लंगड़ाते कुत्ते को देख रही थी...
उसके ज़ख्मो के ऊपर मख्खियां
भिनभिना रहीं थी...
लाल चकते सा ज़ख्म....
मख्खियों के लिए जैसे
गुलाबजामुन। ...
कुत्ता बीच बीच में
मुझे देख लेता...
कराह वाली आवाज़ में धीमे
धीमे भोंखता
मेरे ज़ख्म की पीड़ा
तेज़ हो रही थी...
मैं उठ के लंगड़ा के
चलने लगी...
मख्खियां मेरे ज़ख्म के इर्द-गीर्द
भिनभिनाने लगीं थी!!

Wednesday, August 30, 2017

chaar-deewari


Main kursi mein bethi hoon…

Kamrein mein…

Iss chaar-deewari mein kayi deewar hai…

Do deewaron ke kono ko jodta

Halka utha deewar bhi hai

Dono kono mein…

Iss nikle deewar ki astitva

Aur deewaro se bhinn hai…

Ye tribhujakari hai…

Bhitar rahasyo ka inth-paththar

Thusa ho jaise…

Chaar-deewari ke ye dono tribhujakari deewarein

kaan Hai…

Awaazein nukile hisse se takra

Inme sama jaati hai…

Dheemi swaron mein baatein karti hoon main…

Saamne ke deewar mein…

Chaudhi-choti khidki hai…

Khidki ke aage.…

Patla sikuda raasta hai..

Aur hai lamba sa ek makaan..

Inth-paththron ka makaan…

Makaan mein

Bahut saare chaar-deewarein hain…

Aur unn chaar-deewaron mein kayi deewar..

Main sochti hoon..

Inmein ras kahaan hain??

Inmein kalpana kahaan hain?

Inmein kavita kahaan hai??

Soch mein bhi shayad…

Chaar-deewari hain…

Aur usme kayi deewaar hai…



Divya…

Tuesday, August 29, 2017

Kaanch par boond


Khidki ke kaanch par phisalti

Boond…

Ulkaon si takrayi thi kaanch se..

Twarit  talashti thi raah..

Chikne samtal kaanch par…

Pratirodhhin sthal bhi karta hai,

Gati awrodh…

Chiknayi ki gharsan ki kriya-pratikriya…

Taduprant,

Dhire dhire rukti boond…

Vilin ho jati hai…

Khidki ke niche jame jal mein…

Apne niyat sthan mein….

Apni niyati liye….

Divya..




Wednesday, January 25, 2017

anischit pyar

टापू में तुम अकेले हो...
पानी है...
पेड़ है...
प्यार भी है...
प्यार एकतरफा नहीं है...

वो लड़की है मकान में...
पानी है
पत्थर है..
प्यार भी है...
प्यार एकतरफा नहीं है...

पर प्यार...
अनिश्चित है....
दोनों के रूह में। .
ह्रदय में....

दिव्या....

Sunday, February 7, 2016

जिस्म कभी शास्वत नहीं होता

तुम्हारे हाथ
जिस्म के धागे
तेज़ी से उतार फेंकेंगे...

अनावृत जिस्म को देख,
तपिश से थरथराते तुम्हारे
होंठ बेतहाशा चूमेंगे जिस्म का
पोर-पोर...

हर एक उभार पर
तुम कस कर पीड़ा
बहने दोगे...

आवेग में झुलसते
तैरते..
थक कर...चूर हो
तुम मुह फेर...
करवट ले तब सो जाओगे...


तुम्हे सोते देख..
जगे जगे सोचूंगी मैं...
क्या सपने में मेरे जिस्म
की मोहन जोदाड़ो की
कलाकृति दिखती है तुम्हे??
क्या तुम उससे प्रेम से सहलाते हो ??
क्या तुम उसे सेहराते हो ??

बेसिरपैर के सोच से घिरी मैं...
तुम्हारे लिजलिजे हाथो से छुए
अपने जिस्म को धोउंगी फिर...

तुम्हारी कामुकता मेरे जिस्म के
पोर पोर भले ही नोच डाले
रोज़ रोज़...

मेरे आत्मा के बंधे धागे
कभी नहीं खोल पाएंगे...
जिस्म कभी शास्वत नहीं होता...

दिव्या....



Monday, January 18, 2016

रडिओधर्मी...

एक अदृश्य आग की दहक
है...
हवनकुंड है शायद अंत:स्थल में...
स्पर्श नहीं...
 एहसास जता रहे हैं...
भीतर की अस्थिरता को...
क्या ये परमाणु के विघटित होने
की प्रक्रिया का आरम्भ है ?

पोर पोर से कण निकल
कर टकराते है देह से...
आत्मा करते है छलनी छलनी...
क्षण क्षण कई कण भेदते
रहते है...
मेरे बिखरे अस्तित्व को...

अल्फा, बीटा और गामा रे....
प्रभाव दिखाते रहेंगे...
विध्वंस होगा मेरे हर और...
गुज़रते वक़्त के साथ क्षय
होती रहूंगी मैं..
मैं एक रडिओधर्मी परिवर्तित व्यक्ति....

दिव्या...











Wednesday, May 14, 2014

Gulmohar bulata hai....

Gulmohar bulata hai mujhe apne paas...

Sapno me tera chehra nahi
Na raat surmayi,din sunehara nahi
Chand baton se dil nahi judte
Satahi rishta hai koi gehra nahi
Rishte Seenchne ka na raha koi prayaas

Gulmohar bulata hai mujhe apne paas..

Apni duniya ka sagar samhal lo
Kinaro se kashtiyaan nikal lo
Sahara le ke sagar paar mat jao
Kharepan ko hatao sagar ubaal lo
Ladi ladi tod do na rehne do koi aas..

Gulmohar bulata hai mujhe apne paas