Popular Posts

Sunday, April 6, 2008

जुदाई की शामें....

चलों, उन शामों की बातें करें..
जब हम तुम दूर दूर..
तन्हाई या भीड़ में..
घिरे होंगे...
हम होंगे इधर,तुम होंगे वहाँ...

स्मृति की फाटक पर दस्तक देंगी
आज की शामें,जिन शामों
की लालिमा पीलिमा में बिखरे
पड़े हैं हम दोनों के हास्य, रुदन
हाथ थामे विचरते हुए की
अधूरी तस्वीरें,बेसुरे गाने लबों
से फुटते-लजाते हुए,बिन पहचानी
गलियों में पूछ-पूछ कर भटकते नज़ारे
और जाने कितनी ही अनछुई,मिटास भरी यादें
जिनके स्मरण से ही नयन मुस्करा देंगे...
हम दोनों के,भले ही.....
हम होंगे इधर,तुम होंगे वहाँ....

बरस बीतेंगे,फासले होंगे ही होंगे
मिलन की आस,विछोह की विरह
घुल कर सयद नयी भावना का
आविष्कार करें,निज जीवन
के दैनिक कार्यों से निर्व्रित हो
हर शाम वायु के सर्रसर्राहट में,
सूरज के डूबते हुए अक्स में,
निशि के घटते-बढ़ते आकार में,
एक क्षण को भी तेरी महक छू जाए तो
लम्हा-लम्हा प्रकृति के ताल पर
थिरक उठेगा,बाग़-बाग़ डाल-डाल तेरी
अनसुनी आवाज़ से चहक उठेगा,
मेरे ह्रदय के संप्रेषण से
तेरी हर शाम भी खिल उठेगी....
मेरे दोस्त,उस पल भी..
हम होंगे इधर,तुम होंगे वहाँ....

No comments: